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“हेलोवीन 🎃 डे” भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य का हमला : कहाँ हैं ” सनातन” के अलमबरदार !

Ο हर वर्ष 31 अक्टूबर को मनाया जाता है ” हेलोवीन 🎃 डे” भूतिया त्यौहार
Ο कान्वेंट स्कूलों द्वारा हमारे देश की संस्कृति को तहस नहस करने की साजिस : जसबीर सिंह मलिक
Ο सनातन धर्म के किसी भी ठेकेदार की इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आना दुर्भाग्य पूर्ण: जसबीर सिंह मलिक
Ο पश्चिमी देशों द्वारा कान्वेंट स्कूलों को फंडिंग की आशंका : जसबीर सिंह मलिक

डरावने भूतिया चेहरे और अजीबो-गरीब डेकोरेशन का विदेशी त्योहार हेलोवीन डे (halloween Day) हमारी प्राचीन सनातन संस्कृति के विपरीत माना जा रहा है l हैलोवीन का खुमार पश्चिमी देशों के जरिये अब भारत पर भी चढ़ने लगा है l पहले यह मुंबई के कान्वेंट स्कूलों और क्लबों में में प्रचलित था लेकिन अब यह भूतिया त्यौहार देश की राजधानी दिल्ली व् आसपास के बड़े शहरों गुरुग्राम-नोएडा के क्लबों व् कान्वेंट स्कूलों में खास ढंग से मनाया जा रहा है l

हर वर्ष 31 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस त्यौहार की तैयारियां लोग कई दिन पहले से ही शुरू कर देते हैं. खासकर बच्चों में इसका क्रेज देखते ही बनता है. हैलोवीन को ऑल हैलोवीन, ऑल हेलोस ईवनिंग और ऑल सेंट्स ईव भी कहा जाता है.

हैलोवीन पर बड़ी-बड़ी थीम पार्टी आयोजित की जाती हैं जिसमें सभी के कपड़े और मेकअप भूत की तरह डरावने होते हैं. पश्चिमी देशों में इस दिन पड़ोसी और रिश्तेदारों को चॉकलेट देने का रिवाज है. इस पर्व को मनाने का मुख्‍य उद्देश्‍य पूर्वजों की आत्मा को शांति देना है.

” Halloween 2023: डरावने भूतिया चेहरे और अजीबो-गरीब डेकोरेशन हैलोवीन की खासियत है. हैलोवीन का खुमार सिर्फ पश्चिमी देशों में ही नहीं अब भारत पर भी चढ़ने लगा है. हर वर्ष 31 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इस त्यौहार की तैयारियां लोग कई दिन पहले से ही शुरू कर देते हैं. खासकर बच्चों में इसका क्रेज देखते ही बनता है. हैलोवीन को ऑल हैलोवीन, ऑल हेलोस ईवनिंग और ऑल सेंट्स ईव भी कहा जाता है.

 

कैसे हुई हैलोवीन की शुरुआत
हैलोवीन के इतिहास को लेकर अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं. कुछ लोगों का मानना है कि इसकी शुरुआत लगभग 2000 वर्ष पहले हुई थी. तब उत्तरी यूरोप में इसे ‘ऑल सेंट्स डे’ के रूप में मनाया जाता था. इस दिन मरे हुए लोगों की आत्‍माएं धरती पर आकर सामान्‍य लोगों को परेशान किया करती थीं. जिन्‍हें भगाने और डराने के लिए लोग डरावने कपड़े पहना करते थे और जगह-जगह पर आग जलाकर बुरी शक्तियों को दूर करते थे. वहीं कुछ किसानों का मानना था कि बुरी आत्‍माएं धरती पर आकर उनकी फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं, इसलिए उन्‍हें डराने और फसल से दूर रखने के लिए खुद डरावने कपड़े पहन लेते थे. लेकिन वर्तमान में इस त्‍योहार को केवल मौज-मस्ती के लिए मनाया जाता है.

ऐसे करते हैं सेलिब्रेट
पुरानी मान्‍यता है कि हैलोवीन में लोग अपने घरों में जैक ओ लैंटर्न बनाते हैं और उसी के आधार पर घर को डरावना लुक देते हैं. पश्चिमी देशों में कद्दू को शुभ माना जाता है इसलिए इस दिन लोग नारंगी रंग के कद्दू को खोखला कर उसमें नाक, आंख और मुंह बनाते हैं. कद्दू के मुंह के अंदर मोमबत्ती जलाकर दरवाजे पर या पेड़ पर टांगते हैं. इससे बुरी आत्‍माएं घर में प्रवेश नहीं कर पाती. हैलोवीन के बाद इन कद्दुओं को जमीन में दफना दिया जाता है.

इसके अलावा पड़ोसी एक-दूसरे को कैंडी और चॉकलेट तोहफे के तौर पर देते हैं ताकि रिश्तों में मधुरता बनी रहे. वैसे तो त्योहारों में लोग नए कपड़े पहनते हैं लेकिन ये एकमात्र ऐसा त्यौहार है जिसमें पुराने और गंदे कपड़े पहने जाते हैं. इस दिन को सेलिब्रेट करने के लिए लोग एक जगह इकट्ठे होते हैं और देर रात तक गेम्‍स और डांस का लुत्फ उठाते हैं.

” हेलोवीन 🎃 डे” नाम के इस नए भूतिया त्यौहार पर सनातन धर्म के अलंबरदारों की तो अभी तक कोई पतिक्रिया नहीं मिली है अलबत्ता खाप नेताओं में बुद्धिकीवी वर्ग की प्रतिक्रिया जरूर आई है l जाट रत्न साहित्यिक पत्रिका के सम्पादक, महापुरुष स्मृति सभा के राष्ट्रिय अध्यक्ष व मालिक खाप के राष्ट्रिय प्रवक्ता जसबीर सिंह मलिक का कहना है कि,इस तरह के त्यौहार भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति का हमला है l इस भूतिया त्यौहार के समर्थक व आयोजक सर पर सींग लगा,डरावना सा मुखौटा लगा करसमज को क्या संदेश देना चाहते हैं यह समझ से परे है l

जसबीर सिंह मलिक का कहना है कि पश्चिमी देशों की तर्ज पर भारत के अंग्रेजी कांवेंट स्कूलों में इस भूतिया त्यौहार को मनाने के लिए हजारों बच्चों से भूत वाली ड्रेस खरीदवाई गई। स्कूल प्रबंधन की और से बच्चों को निर्देश दिए गए कि आज सभी को भूत बन कर आना है,l जो सबसे अच्छा भूत halloween 👹बन कर आएगा उसे प्रतियोगिता में इनाम मिलेगा। जसमेर मालिक ने कहा कि अपने रीति रिवाज,संस्कार,महापुरुष तो संभाले नहीं जाते मगर विदेशियों का अनुसरण जरूर करेंगे। मालिक बोले कि कान्वेंट स्कूलों द्वारा हमारे देश की संस्कृति को तहस नहस करने की साजिस है l

जसबीर सिंह मलिक का कहना है कि यह देश के भविष्य हमारे बालकों के दिमाग में भगत सिंह, राजगुरु व चंद्रशेखर आज़ाद के शौर्यगाथाओं को मिटाने और पाश्चात्य रंग में रंगने का जरिया है l आशंका है कि इस के लिए पश्चिमी देशों द्वारा कान्वेंट स्कूलों को फंडिंग की जा रही है ? श्री मालिक ने कहा कि भारतीय संस्कृति व भारतीय समाज के हित चिंतकों को इस का विरोध करना चाहिए l लेकिन सनातन धर्म के किसी भी ठेकेदार की इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आना दुर्भाग्य पूर्ण है l

Online Dainik Bhaskar

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